यतो धर्मस्ततो जय:
प्रस्तुत लेख एक समरधुरंधर किन्तु अधर्मी औऱ क्रूर शासक के जीवन पर आधारित है। जिसनें चंद्रगुप्त की तरह अपने शासन का विस्तार तो बहुत किया, लेकिन कट्टरपंथ और वहशत का कभी न मिटने वाला दाग अपनी सियासत पर लगा लिया। तो बात करते है छठे मुगल बादशाह आलमगीर औरंजेब की, जिसका जन्म आज ही के दिन,401 साल पहले याने 4 नवंबर 1618 में गुजरातस्थित दाहोद क्षेत्र में हुआ था।
दिल्ली के तख्तपर औरंगजेब की ताजपोषी जरा भी सहज ढंगमें नहीं हुई। पिता शाहजहां ने उसे प्रायः दक्खन का सूबेदार नियुक्त किया था, किन्तु कुछ पारिवारिक बेबनाव के कारण उसे गुजरात भेजा गया। गुजरात में उसके प्रशासनसे खुश होकर बादशाह शाहजहांने उसे आज के अफगानिस्तानका भी सरगना बना दिया। लेकिन जैसे ही शाहजहां का स्वास्थ बिगड़ा, औरंगजेब ने अपने भाई दारा शुकोह से जंग छेड़कर उसे न सिर्फ परास्त किया, अपितु उसे कैद करवा कर सर कलम कर दिया। सत्ता के लालच में औरंगजेबने अपने पिता शाहजहां को भी बंदी बना दिया। कुछ इतिहासकारोके अनुसार उसीने शाहजहाँ की हत्या भी करवाई औऱ खुदको नया बादशाह ऐलान कर दिया।
अपने राजनीतिक कार्यकाल में औरंगजेब बेहद सफल रहा। मुगलों के इतिहास में उसका शासन अद्वितीय तथा अतिविस्तीर्ण था, दक्षिण में मराठा सत्ता का अपवाद यदि छोड़ दे, तो औरंगजेब ने सभी पड़ोसी सल्तनतें ध्वस्त कर दी। उसके कार्यकाल में भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था बना। उस समय शासन को लगभग 250 करोड़ रुपयोका राजस्व प्राप्त होता था। इतना ही नहीं, उसके कार्यकाल में विश्व के कुल उत्पाद का 25 प्रतिशत भारत में निर्मित होता था, जो सम्पूर्ण यूरोप से भी कईगुना ज्यादा था।
लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद औरंगजेब को एक क्रूर आक्रांता माना जाता है। वह एक कट्टरपंथी इस्लामी शासक था जिसने सम्पूर्ण गैर इस्लामी प्रजा पर सर्वप्रथम जिज़िया कर लगाया, शरिया का जबरन इस्तेमाल किया। उस के कार्यकाल में हजारों मंदिरोंको तोड़ा गया, महिलाओं का व्यापार और जबरन धर्मान्तर चरम पर पहुँचा तथा धार्मिक सामंजस्य शून्य पर आगया। अपने बड़े भाई दारा शुकोह की तरह सिखोंके के 9वे गुरु तेग़ बहादुरजी को भी औरंगजेबने बहुत बर्बरता से मार डाला। छत्रपति शिवजी महाराज के बेटे धर्मवीर छत्रपति संभाजी महाराज की भी उसने बर्बरतासे हत्या कर दी ।
अपने जीवन के अंतिम भागमें उसे दक्षिण में मराठाओंके खिलाफ प्रदीर्घ विफलता का सामना करना पड़ा। 88 साल की आयु में महाराष्ट्रके अहमदनगर में इस क्रूरकर्मा की मौत हो गयी।
औरंगजेब का चरित्र इस बात का प्रमाण है की केवल आर्थिक उन्नति एवं राजनैतिक स्थिरता से कोई यशस्वी तथा लोकाभिमुख शासक नहीं बन सकता। नीति और सहिष्णुता ही एक राजा को महान बनाती है। महज 4 जिलों जितनी भूमी पर राज करके भी देश में छत्रपति शिवाजी महाराज को आदर्श राजा के तौर पर देखा जाता है जबकि आलमगीर होकर भी औरंगजेब के नाम पर बनी सड़के भी आज कलाम जैसी हस्तियोंके नाम पर नामांतरीत क़ी जा रहीं है।अंत में यहीं सत्यापित होता है- यतो धर्म: ततो जय:।
-प्रथमेश चौधरी
४ नवंबर २०१९
5 Comments
जबरदस्त
ReplyDelete😁🙏
Deleteबोहोत खूब 😊👌👌
ReplyDelete☝️Specially शेवट खूप छान आहे 👌👍
Deleteएकदम सही!!
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